Tag: Shishir

I Say Chaps

Badal

गहरे मानसून का बादल हूँ, बन के मोती पिघलता हूँ, ग़र करोगे याद पाओगे मुझे मैं हर सावन सफ़र करता हूँ । मैंने देखा है तेरी आँखों में यादों की एक कशिश सी, वो शिकवे वो शिकायतें, जज़्ब अरमानों का वो सूखा दरिया, अबकी ऐसा करता हूँ, तेरी ही छत से होके गुजरता हूँ, बस…
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July 14, 2021 0

Nostalgia

सुनो, आज फिर मिलते हैं, कुछ क़िस्से पुराने सुनाते हैं, कुछ गीत नए गुनगुनाते हैं।   वो बचपन की मधुर यादें, वो नानी दादी की बातें, वो सपने पतंग के पेंच के, वो, अफ़साने शीला की जवानी के, गाँव के पुराने बरगद की छांव, वो बारिश में काग़ज़ की नाव, वो कैंची डंडे की साइकल,…
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June 27, 2021 0

ISOPARB-Lohri Delight: An Unofficial Newsletter.

  I was under such a swivet about attending this Lohri-Special, power-packed, webinar Of ISOPARB West Up Chapter that my feet were literally shaking. Thank God it was a cold winter evening and my wife thought it was owing to the low temperature. Whereas, the fact of the matter was that the prospect of attending…
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January 13, 2021 0

MIXOPATHY…ANOTHER NAIL IN THE COFFIN

“If you cannot compete, impede.” The term ‘Mixopathy” does not have a dictionary meaning, nor does it have a legitimate definition behind its origin and use, it is as illegitimate as the government intention behind the notification to legalise the practice of allopathic procedures by Ayurvedic doctors. Over the past few years, there has been…
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December 11, 2020 2

ये समर विशेष है

(२) ये समर विशेष है समय वस्तुतः बड़ा विचित्र है। पुष्प लहलहा रहे बाग़ में, पंछी चहकते नील गगन में, वातावरण सिंचित है प्राण वायु से किंतु प्राण संशित है वातावरण से, मनुज बँधा भय की लक्ष्मण रेखा में,  पशु स्व्क्छंद विचारते शहर शहर में।  विचित्र ये नहीं कि समर फिर सज़ा है प्रलय और विलय के काल कुरुछेत्र में, अपितु ये…
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April 3, 2020 2

कुरुक्षेत्र

समय आया बड़ा विचित्र है,क्षितिज पर अजीब चित्र है,धरा का भी हाल बेहाल है,दिशाओं में फैला काल है,व्याधि घुली है फिज़ाओं में,आसमानी सागर भी लाल है,पार्थ संबोधित है अर्जुन से,खड़ा कलयुगी कुरुक्षेत्र में।। पतंगा लील रहा ज्योति को,दूषित, कलुषित जल गंगा का।आदि चीख रहा अनादि को,व्यभिचारी सुर मन मृदंगा का।किस्से और क्यों मैं समर करूं,धर्म…
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January 1, 2020 3

सफ़र

चाहतें यूं ही नहीं अक्सर मंज़िल को तरस जाती हैं,बस्ती और वीराना दोनों मुझसे नाराज़ है। सैलाब कब का, पशेमां हो कर गुज़र चुका है, हवाओं को नजाने क्यों खुद पे नाज़ है। वफ़ा सरे राह बैठी है एक तल्मीह के इंतज़ार में, जाने तेरे रुखसार में वो क्या इक राज़ है। शायरी क्या है…
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December 31, 2019 1

गुफ़्तगू

एक शाम यादों में , एक शाम आहों में। एक पुराना बरगद और उसपे बैठा इक परिंदा। गाँव की गलियाँ वो रंगरलियाँ, इमली के पेड़ और गुड़ की डलियाँ , एक तेरे शहर का शोर और , एक ख़ामोशज़दा बाशिंदा, बरगद टूट रहा, साथी छूट रहा, परिंदा बेचैन है फ़िज़ाओं में । एक शाम आँखों…
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December 27, 2019 0

Ageing gracefully

Perhaps compare to the rest of the day, the Sun looks most beautiful in the twilight when the cloudy wrinkles enhance its aesthetic features making it glow with the trueness of its colours. Hi Shishir; Surprised? Oh! Don’t be. My voice sounds a little shaded yet so familiar. you should look at my picture, the…
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October 6, 2019 2

Yog….Discovery of thy self

खर्राटों की मधुर ध्वनि sounds quite an oxymoron, isn’t it? The inherent humour in this comical oxymoron has a degree of positivity that has the power to culminate into the enormity of laughter therapy. That’s the power of yoga. Fifth international Yoga day celebration at IMA Bhawan Ghaziabad gave me this enlightening opportunity to dwell…
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June 21, 2019 2