टहलते कदम…

एक उम्र से एक मुकाम की तलाश में…
जाने कब किस ओर ले कर चलते हैं
मुझको ये मेरे टहलते कदम।

मैं तो बस मैं हूं…घुमड़ते अब्र सा
हवाओं के रुख पर टहलता हूं।

एक उम्र से एक मुकाम की तलाश में…
पथरीले रास्तों पर कभी
खुशनुमा वादियों में कभी
लहरों के वेग सा चपल कभी
ठहरी झील सा सबल कभी

गहरे सागर के गर्त में कभी
मरु के तपते समर में कभी
अनजान शिखरों की चोटियों पर
तो कभी
ज़िन्दगी के महकते बसर में।

एक उम्र से एक मुकाम की तलाश में…
शब्दों में सुकून तलाशता मैं
हर रोज़ एक नए सफर पर निकलता हूं।

मैं तो बस मैं हूं… घुमड़ते अब्र सा
हवाओं के रुख पर टहलता हूं।।



6 Comments Add yours

  1. P k sinha says:

    Superb kabita

  2. Sunil jain says:

    बहुत खूब कविता। शिशिर तुम्हारा जवाब नहीं।

  3. Rahul Varma says:

    Awesome, as always.. Great

  4. PRABHAT says:

    Again a masterpiece Sir,

  5. viinod says:

    Really….some heroes have no …..face..

  6. Anshu Sharma says:

    Wonderful poem

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