Category: Poems

I Say Chaps

Badal

गहरे मानसून का बादल हूँ, बन के मोती पिघलता हूँ, ग़र करोगे याद पाओगे मुझे मैं हर सावन सफ़र करता हूँ । मैंने देखा है तेरी आँखों में यादों की एक कशिश सी, वो शिकवे वो शिकायतें, जज़्ब अरमानों का वो सूखा दरिया, अबकी ऐसा करता हूँ, तेरी ही छत से होके गुजरता हूँ, बस…
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July 14, 2021 0

Nostalgia

सुनो, आज फिर मिलते हैं, कुछ क़िस्से पुराने सुनाते हैं, कुछ गीत नए गुनगुनाते हैं।   वो बचपन की मधुर यादें, वो नानी दादी की बातें, वो सपने पतंग के पेंच के, वो, अफ़साने शीला की जवानी के, गाँव के पुराने बरगद की छांव, वो बारिश में काग़ज़ की नाव, वो कैंची डंडे की साइकल,…
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June 27, 2021 0

ये समर विशेष है

(२) ये समर विशेष है समय वस्तुतः बड़ा विचित्र है। पुष्प लहलहा रहे बाग़ में, पंछी चहकते नील गगन में, वातावरण सिंचित है प्राण वायु से किंतु प्राण संशित है वातावरण से, मनुज बँधा भय की लक्ष्मण रेखा में,  पशु स्व्क्छंद विचारते शहर शहर में।  विचित्र ये नहीं कि समर फिर सज़ा है प्रलय और विलय के काल कुरुछेत्र में, अपितु ये…
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April 3, 2020 2

शिशिर की ठिठुरती रात

ठंडी, सूनी श्यामल राहों को, शबनम की बूंदों का साथ है, ये शिशिर की ठिठुरती रात है। धूमिल चांदनी, चढ़ता कुहासा शुष्क शाखों पर दुबके पंछी, चौपालों की सहमी झुर्रियों को, स्नेही प्रज्वला की सौगात है। ये शिशिर की ठिठुरती रात है। लोहड़ी के सुमधुर गीतों पर, ठुमकते कदम, पिघलती बाहें , अनकही, कल्पित आंहों…
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January 10, 2020 0

कुरुक्षेत्र

समय आया बड़ा विचित्र है,क्षितिज पर अजीब चित्र है,धरा का भी हाल बेहाल है,दिशाओं में फैला काल है,व्याधि घुली है फिज़ाओं में,आसमानी सागर भी लाल है,पार्थ संबोधित है अर्जुन से,खड़ा कलयुगी कुरुक्षेत्र में।। पतंगा लील रहा ज्योति को,दूषित, कलुषित जल गंगा का।आदि चीख रहा अनादि को,व्यभिचारी सुर मन मृदंगा का।किस्से और क्यों मैं समर करूं,धर्म…
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January 1, 2020 3

सफ़र

चाहतें यूं ही नहीं अक्सर मंज़िल को तरस जाती हैं,बस्ती और वीराना दोनों मुझसे नाराज़ है। सैलाब कब का, पशेमां हो कर गुज़र चुका है, हवाओं को नजाने क्यों खुद पे नाज़ है। वफ़ा सरे राह बैठी है एक तल्मीह के इंतज़ार में, जाने तेरे रुखसार में वो क्या इक राज़ है। शायरी क्या है…
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December 31, 2019 1

गुफ़्तगू

एक शाम यादों में , एक शाम आहों में। एक पुराना बरगद और उसपे बैठा इक परिंदा। गाँव की गलियाँ वो रंगरलियाँ, इमली के पेड़ और गुड़ की डलियाँ , एक तेरे शहर का शोर और , एक ख़ामोशज़दा बाशिंदा, बरगद टूट रहा, साथी छूट रहा, परिंदा बेचैन है फ़िज़ाओं में । एक शाम आँखों…
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December 27, 2019 0

टहलते कदम…

एक उम्र से एक मुकाम की तलाश में… जाने कब किस ओर ले कर चलते हैं मुझको ये मेरे टहलते कदम। मैं तो बस मैं हूं…घुमड़ते अब्र सा हवाओं के रुख पर टहलता हूं। एक उम्र से एक मुकाम की तलाश में… पथरीले रास्तों पर कभी खुशनुमा वादियों में कभी लहरों के वेग सा चपल…
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March 12, 2019 6

मेरे हृदय की अविरल गंगा

(1) नतमस्तक बैठा हूं सुनहरी सांझ के गलियारों में हृदय में अपने सृजन की विस्मित झंकार लिए, गर्भ की चोटिल हुंकारों का, विरही तन की मरमित पुकारों का, ज्वर से तपती रातों में बोझिल आंखों के करुण कृंदन का, नादान बचपन की कहानियों पर बरसते तेरे स्नेहिल चुंबन का, मेरी हर भृमित जीत पर उड़ते…
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March 8, 2018 2

होली आई

    सुन्दर सजल रंगीले, कुछ लाल कुछ पीले, मेरे ख्वाबों के दस्ते। पलाश के फूलों की महक लिए, आंखों में हुड़दंग की ललक लिए, मेरे यारों के दस्ते। वो पुकारते मुझे, मैं पुकारता उन्हें लेकर अपनी चाहतों के गुलदस्ते। मैं मृदंग हूं, मैं ताल हूं, ठंडाई का घूंट पिये, मैं मदमस्त चाल हूं फाल्गुन…
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February 26, 2018 1