मेरे हृदय की अविरल गंगा

(1) नतमस्तक बैठा हूं सुनहरी सांझ के गलियारों में हृदय में अपने सृजन की विस्मित झंकार लिए, गर्भ की चोटिल हुंकारों का, विरही तन की मरमित पुकारों का, ज्वर से तपती रातों में बोझिल आंखों के करुण कृंदन का, नादान बचपन की कहानियों पर बरसते तेरे स्नेहिल चुंबन का, मेरी हर भृमित जीत पर उड़ते…
Read more


March 8, 2018 2