ये समर विशेष है

(२) ये समर विशेष है समय वस्तुतः बड़ा विचित्र है।  पुष्प लहलहा रहे बाग़ में,  पंछी चहकते नील गगन में,  वातावरण सिंचित है प्राण वायु से  किंतु प्राण संशित है…

कुरुक्षेत्र

समय आया बड़ा विचित्र है, क्षितिज पर अजीब चित्र है, धरा का भी हाल बेहाल है, दिशाओं में फैला काल है, व्याधि घुली है फिज़ाओं में, आसमानी सागर भी लाल…

सफ़र

चाहतें यूं ही नहीं अक्सर मंज़िल को तरस जाती हैं,बस्ती और वीराना दोनों मुझसे नाराज़ है। सैलाब कब का, पशेमां हो कर गुज़र चुका है, हवाओं को नजाने क्यों खुद…

गुफ़्तगू

एक शाम यादों में , एक शाम आहों में। एक पुराना बरगद और उसपे बैठा इक परिंदा। गाँव की गलियाँ वो रंगरलियाँ, इमली के पेड़ और गुड़ की डलियाँ ,…

%d bloggers like this: