Thursday, October 29

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ये समर विशेष है
Poems

ये समर विशेष है

(२)ये समर विशेष है समय वस्तुतः बड़ा विचित्र है।  पुष्प लहलहा रहे बाग़ में,  पंछी चहकते नील गगन में,  वातावरण सिंचित है प्राण वायु से  किंतु प्राण संशित है वातावरण से,  मनुज बँधा भय की लक्ष्मण रेखा में,   पशु स्व्क्छंद विचारते शहर शहर में।  विचित्र ये नहीं कि समर फिर सज़ा है  प्रलय और विलय के काल कुरुछेत्र में,  अपितु ये कि दुराचारी दुर्योधन आज  अनंत है, विलुप्त है छिपा है शून्य में,  अद्रश्य शस्त्र  संजोये अपने तरकश में,  अर्जुन आच्छादित है अज्ञानता के तीरों से  सैकड़ों दुशसशासन विष धर रहे मरकज़ में।    समर विचित्र में प्राणजायी करों ने कमर कसी है, कमान सम्भाली है,  देवदूतों ने देवदत्त को फूँकारा है,  अर्जुन ने दुर्योधन को ललकारा है, जनमानस की वेदना को  मिटाना है, चक्रव्यूह  काल का बेधना है,   तबलीगी  क्रूरों को धूल चटाना है,  ज़हरीले मंसूबों का तमर  वि...
गुफ़्तगू
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गुफ़्तगू

एक शाम यादों में , एक शाम आहों में। एक पुराना बरगद और उसपे बैठा इक परिंदा। गाँव की गलियाँ वो रंगरलियाँ, इमली के पेड़ और गुड़ की डलियाँ , एक तेरे शहर का शोर और , एक ख़ामोशज़दा बाशिंदा, बरगद टूट रहा, साथी छूट रहा, परिंदा बेचैन है फ़िज़ाओं में । एक शाम आँखों में, एक शाम ख़्वाबों में। एक छोटा सा घर, एक महल सपनों का, एक काग़ज़ की नाव और, एक ठेला जामुन का, एक तेरे जाने की आहट, एक तुझे पाने की चाहत , कश्ती छूट गयी किनारों से मेला लगा बाज़ारों में, एक शाम बाहों ,में एक शाम निगाहों में। मेरा माज़ी भी, मेरा मुस्तकबिल भी, वक़्त की दयोड़ि पर दोनो बैठें हैं आमने सामने, गुफ़्तगू करूँ या मलाल ।। ...
टहलते कदम…
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टहलते कदम…

एक उम्र से एक मुकाम की तलाश में... जाने कब किस ओर ले कर चलते हैं मुझको ये मेरे टहलते कदम। मैं तो बस मैं हूं...घुमड़ते अब्र सा हवाओं के रुख पर टहलता हूं। एक उम्र से एक मुकाम की तलाश में... पथरीले रास्तों पर कभी खुशनुमा वादियों में कभी लहरों के वेग सा चपल कभी ठहरी झील सा सबल कभी गहरे सागर के गर्त में कभी मरु के तपते समर में कभी अनजान शिखरों की चोटियों पर तो कभी ज़िन्दगी के महकते बसर में। एक उम्र से एक मुकाम की तलाश में... शब्दों में सुकून तलाशता मैं हर रोज़ एक नए सफर पर निकलता हूं। मैं तो बस मैं हूं... घुमड़ते अब्र सा हवाओं के रुख पर टहलता हूं।। ...