Thursday, October 29

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ये समर विशेष है
Poems

ये समर विशेष है

(२)ये समर विशेष है समय वस्तुतः बड़ा विचित्र है।  पुष्प लहलहा रहे बाग़ में,  पंछी चहकते नील गगन में,  वातावरण सिंचित है प्राण वायु से  किंतु प्राण संशित है वातावरण से,  मनुज बँधा भय की लक्ष्मण रेखा में,   पशु स्व्क्छंद विचारते शहर शहर में।  विचित्र ये नहीं कि समर फिर सज़ा है  प्रलय और विलय के काल कुरुछेत्र में,  अपितु ये कि दुराचारी दुर्योधन आज  अनंत है, विलुप्त है छिपा है शून्य में,  अद्रश्य शस्त्र  संजोये अपने तरकश में,  अर्जुन आच्छादित है अज्ञानता के तीरों से  सैकड़ों दुशसशासन विष धर रहे मरकज़ में।    समर विचित्र में प्राणजायी करों ने कमर कसी है, कमान सम्भाली है,  देवदूतों ने देवदत्त को फूँकारा है,  अर्जुन ने दुर्योधन को ललकारा है, जनमानस की वेदना को  मिटाना है, चक्रव्यूह  काल का बेधना है,   तबलीगी  क्रूरों को धूल चटाना है,  ज़हरीले मंसूबों का तमर  वि...