शिशिर की ठिठुरती रात

ठंडी, सूनी श्यामल राहों को,
शबनम की बूंदों का साथ है,
ये शिशिर की ठिठुरती रात है।

धूमिल चांदनी, चढ़ता कुहासा
शुष्क शाखों पर दुबके पंछी,
चौपालों की सहमी झुर्रियों को,
स्नेही प्रज्वला की सौगात है।
ये शिशिर की ठिठुरती रात है।

लोहड़ी के सुमधुर गीतों पर,
ठुमकते कदम, पिघलती बाहें ,
अनकही, कल्पित आंहों को,
सूक्ष्म सी निगाहों का साथ है।
ये शिशिर की ठिठुरती रात है।

कहीं मेरी चाहतों की चांदनी,
कहीं, तेरे गेसुओं सा अम्बर,
रंग चढ़ा है शब्दों की मौजों पर,
जैसे फागुन में टेसुओं की बारात है।
ये शिशिर की ठिठुरती रात है।।

Recommended Articles

Leave a Reply

Follow Me!
%d bloggers like this: