सफ़र

चाहतें यूं ही नहीं अक्सर मंज़िल को तरस जाती हैं,बस्ती और वीराना दोनों मुझसे नाराज़ है। सैलाब कब का, पशेमां हो कर गुज़र चुका है, हवाओं को नजाने क्यों खुद…

निशब्द…

हिमगिरि के उतंग शिखर पर बैठा एक महर्षि, आलोकित वाणी से कर रहा युगांतर प्रलय पाठ। इधर श्वेत मूंछों पर करों का कोमल प्रहार, उधर छण भर में युगों का…

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