Tuesday, October 27

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ये समर विशेष है
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ये समर विशेष है

(२)ये समर विशेष है समय वस्तुतः बड़ा विचित्र है।  पुष्प लहलहा रहे बाग़ में,  पंछी चहकते नील गगन में,  वातावरण सिंचित है प्राण वायु से  किंतु प्राण संशित है वातावरण से,  मनुज बँधा भय की लक्ष्मण रेखा में,   पशु स्व्क्छंद विचारते शहर शहर में।  विचित्र ये नहीं कि समर फिर सज़ा है  प्रलय और विलय के काल कुरुछेत्र में,  अपितु ये कि दुराचारी दुर्योधन आज  अनंत है, विलुप्त है छिपा है शून्य में,  अद्रश्य शस्त्र  संजोये अपने तरकश में,  अर्जुन आच्छादित है अज्ञानता के तीरों से  सैकड़ों दुशसशासन विष धर रहे मरकज़ में।    समर विचित्र में प्राणजायी करों ने कमर कसी है, कमान सम्भाली है,  देवदूतों ने देवदत्त को फूँकारा है,  अर्जुन ने दुर्योधन को ललकारा है, जनमानस की वेदना को  मिटाना है, चक्रव्यूह  काल का बेधना है,   तबलीगी  क्रूरों को धूल चटाना है,  ज़हरीले मंसूबों का तमर  वि...
शिशिर की ठिठुरती रात
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शिशिर की ठिठुरती रात

ठंडी, सूनी श्यामल राहों को, शबनम की बूंदों का साथ है, ये शिशिर की ठिठुरती रात है। धूमिल चांदनी, चढ़ता कुहासा शुष्क शाखों पर दुबके पंछी, चौपालों की सहमी झुर्रियों को, स्नेही प्रज्वला की सौगात है। ये शिशिर की ठिठुरती रात है। लोहड़ी के सुमधुर गीतों पर, ठुमकते कदम, पिघलती बाहें , अनकही, कल्पित आंहों को, सूक्ष्म सी निगाहों का साथ है। ये शिशिर की ठिठुरती रात है। कहीं मेरी चाहतों की चांदनी, कहीं, तेरे गेसुओं सा अम्बर, रंग चढ़ा है शब्दों की मौजों पर, जैसे फागुन में टेसुओं की बारात है। ये शिशिर की ठिठुरती रात है।। ...
कुरुक्षेत्र
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कुरुक्षेत्र

समय आया बड़ा विचित्र है, क्षितिज पर अजीब चित्र है, धरा का भी हाल बेहाल है, दिशाओं में फैला काल है, व्याधि घुली है फिज़ाओं में, आसमानी सागर भी लाल है, पार्थ संबोधित है अर्जुन से, खड़ा कलयुगी कुरुक्षेत्र में।। पतंगा लील रहा ज्योति को, दूषित, कलुषित जल गंगा का। आदि चीख रहा अनादि को, व्यभिचारी सुर मन मृदंगा का। किस्से और क्यों मैं समर करूं, धर्म का विकट आज चरित्र है। मत छोड़ो रण तुम गांडीवधारी, फूंक देवदत्त में प्राण, भरो हुंकार। कौरवों को दिशा दो लाक्षाग्रह की, करो उद्घोष एक नए समर का। मन की मलिन वेदना को भींच , रण की धरा को रक्त से सींच, करो उद्घोष एक नए समर का। क्षितिज पर चित्र एक नया बनना है विद्रोही कन्हैया को दर्पण दिखाना है, कर ध्वस्त शिरा हर अफजल की, विजयगीत अभिनन्दन का गाना है। व्यभिचारी महिषासुर का मर्दन कर, भयभीत निर्भया को निर्भय बनाना है। सृष्टि के कण कण, तृण तृण को, मार्ग सन...
सफ़र
My Travel Diary, Poems

सफ़र

चाहतें यूं ही नहीं अक्सर मंज़िल को तरस जाती हैं,बस्ती और वीराना दोनों मुझसे नाराज़ है। सैलाब कब का, पशेमां हो कर गुज़र चुका है, हवाओं को नजाने क्यों खुद पे नाज़ है। वफ़ा सरे राह बैठी है एक तल्मीह के इंतज़ार में, जाने तेरे रुखसार में वो क्या इक राज़ है। शायरी क्या है बस खयालों का एक पुलिंदा, सलामत किताब में अब तलक वो इक गुलाब है। अफवाहों को गर्म रहने दोअभी और उड़ने दो कि, सरे आइना मै हूं तो पशे आइना मेरा हमराज है परिंदा छू के पेशानी जाने वाले का पता दे गया अब सफर शुरु करता हूं, बेसबर आफताब है। ...
गुफ़्तगू
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गुफ़्तगू

एक शाम यादों में , एक शाम आहों में। एक पुराना बरगद और उसपे बैठा इक परिंदा। गाँव की गलियाँ वो रंगरलियाँ, इमली के पेड़ और गुड़ की डलियाँ , एक तेरे शहर का शोर और , एक ख़ामोशज़दा बाशिंदा, बरगद टूट रहा, साथी छूट रहा, परिंदा बेचैन है फ़िज़ाओं में । एक शाम आँखों में, एक शाम ख़्वाबों में। एक छोटा सा घर, एक महल सपनों का, एक काग़ज़ की नाव और, एक ठेला जामुन का, एक तेरे जाने की आहट, एक तुझे पाने की चाहत , कश्ती छूट गयी किनारों से मेला लगा बाज़ारों में, एक शाम बाहों ,में एक शाम निगाहों में। मेरा माज़ी भी, मेरा मुस्तकबिल भी, वक़्त की दयोड़ि पर दोनो बैठें हैं आमने सामने, गुफ़्तगू करूँ या मलाल ।। ...
टहलते कदम…
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टहलते कदम…

एक उम्र से एक मुकाम की तलाश में... जाने कब किस ओर ले कर चलते हैं मुझको ये मेरे टहलते कदम। मैं तो बस मैं हूं...घुमड़ते अब्र सा हवाओं के रुख पर टहलता हूं। एक उम्र से एक मुकाम की तलाश में... पथरीले रास्तों पर कभी खुशनुमा वादियों में कभी लहरों के वेग सा चपल कभी ठहरी झील सा सबल कभी गहरे सागर के गर्त में कभी मरु के तपते समर में कभी अनजान शिखरों की चोटियों पर तो कभी ज़िन्दगी के महकते बसर में। एक उम्र से एक मुकाम की तलाश में... शब्दों में सुकून तलाशता मैं हर रोज़ एक नए सफर पर निकलता हूं। मैं तो बस मैं हूं... घुमड़ते अब्र सा हवाओं के रुख पर टहलता हूं।। ...
मेरे हृदय की अविरल गंगा
Page 3, Poems

मेरे हृदय की अविरल गंगा

(1) नतमस्तक बैठा हूं सुनहरी सांझ के गलियारों में हृदय में अपने सृजन की विस्मित झंकार लिए, गर्भ की चोटिल हुंकारों का, विरही तन की मरमित पुकारों का, ज्वर से तपती रातों में बोझिल आंखों के करुण कृंदन का, नादान बचपन की कहानियों पर बरसते तेरे स्नेहिल चुंबन का, मेरी हर भृमित जीत पर उड़ते तेरे मन पतंगा का, और मेरी हर हार पर अश्कों से छलकती गंगा का. मेरे आने की आहट तकती दृवार पर टिकी निगाहों का, मैं साक्षी हूं तेरी हर वेदना, हर संवेदना का, तुम ममतामई, तुम प्रेरणादाई, तुम्हीं संचित मेरे जीवन के उजियारों में, नतमस्तक बैठा हूं मैं सुनहरी सांझ के गलियारों में.                                                                      ...
होली आई
Page 3, Poems

होली आई

    सुन्दर सजल रंगीले, कुछ लाल कुछ पीले, मेरे ख्वाबों के दस्ते। पलाश के फूलों की महक लिए, आंखों में हुड़दंग की ललक लिए, मेरे यारों के दस्ते। वो पुकारते मुझे, मैं पुकारता उन्हें लेकर अपनी चाहतों के गुलदस्ते। मैं मृदंग हूं, मैं ताल हूं, ठंडाई का घूंट पिये, मैं मदमस्त चाल हूं फाल्गुन की नर्म दुपहरी में, सूरज सी बाहें फैलाए, होली का गुलाल लिए, वो पुकारते मुझे, मैं पुकारता उन्हें, लेकर अपनी चाहतों के गुलदस्ते। होली के अबीर गुलालों के दस्ते, मेरे ख्वाबों के दस्ते, आये, मेरे यारों के दस्ते।। ...